Saturday, 10 November 2012

The Fox and The Crow Story in Sanskrit (लोमश: एवं काक:)

story-1                       लोमश: एवं काक:
एकस्य काकस्य मुखे रोटिका आसीत । स: वृक्षस्य उपरि शाखायां अतिष्ठत् | तत: एक: लोमश: तत्र आगच्छत | लोमश: काकस्य मुखे रोटिकां दृष्टवा अचिन्तयत् यदि ऐष: मुखम् विवृन्त करोति तदा अस्य रोटिका नीचै: पतिष्यति , अहं च खादिष्यामि |  
स: उच्चै: मुखम् कृत्वा वदति, " हे काक ! त्वं तु अति सुन्दर: असि | तव स्वर: अपि मधुर: भवेत् |"  

काक:  प्रश्नसाम् श्रुत्वा यदा गायति , तदा तस्य मुखात् रोटिका अधः पतति | 
लोमश: रोटिकाम्  खादित्वा शीघ्रम् तत: पलायनं करोति |
story-2                  समानशक्तिं न बिभर्ति सर्व:
कश्रित  मयूर: सवीयान् कान्तिमत: पक्षान प्रसार्य बकमुवाच - पश्य मदीयान पक्षान् | एते इन्द्र्चापरमणीया विभान्ति | त्वदीया: पक्शास्तु धुसर्वर्णा मलिनप्रायाश्च सन्ति |  ईतोअधिक: कुतित्स्वर्णो  मया क्वचित् न विलोकित्: |

बक: प्रोवाच - शृणु रे मयूर | यदा हं स्वीयान् लघु-पक्षान् प्रसार्य विशाले गगने स्वैरं विहरामि, तदा किय्न्त्मान्न्दमनुभवामि |त्वं तु संकुचित-पक्ष: शिरोअव्नम्य अवकारराशौ चज्च्वा खाध्यं विव्हिनोषि | किं तदा त्वं शोभन: प्रतीयसे |  मन्ये, त्वादृश: सुन्दर: पक्षी नैवास्ति, परं स्वचन्दम्  आकाश-विहारस्य निरतिश्यानन्देन वञ्चितोअसि | अत: स्वीयं सौन्द्र्यदर्पं परिजहीहि |

                             एक्सिम्न् यद्धि वैशिश्द्यं 
                                                   तदन्यत्र न दृश्यते |
                             प्रभो: सृष्टिविर्चित्राणां 
                                                   गुणानामद्भुतालय: ||
अर्थार्त : एक मोर अपने सुन्दर पंखो को फैलाकर बगुले से बोला - मेरे पंख देखो । ये इन्द्रधनुष के समान चमक रहे हैं । तुम्हारे पंख तो मट्मैले हैं ।इनसे अधिक बुरा रंग तो मैंने नहीं देखा ।
बगुला बोला - अरे मोरे सुनो । जब मैं अपने हलके पनको को फैलाकर विशाल आकाश में स्वछंद विचरण करता हूँ, तब मुझे महान आनंद की अनुभूति होती है । तुम तो अपने पंख सिकोड़ कर सिर झुका कर कूड़े के ढेर में चोंच से खाना तलाश्ते हो । क्या तब तुम अच्छे लगते हो ? मैं मानता हूँ तुम्हारा जैसा पक्षी कहीं नहीं है, किन्तु तुम खुले आकाश में स्वछंद करने के परम आनंद से वंचित हो । इसलिए तुम अपने सुन्दर होने का गर्व त्याग दो ।
जो विशेषता एक मनुष्य में होती है, वह किसी दुसरे में दिखाई नहीं पड़ती । परमात्मा की सृष्टि तो विचित्र गुणों तथा विशिताओं का संग्रहालय है ।